क्या मिला नहीं जाना,
पर सब कुछ छूटता चला गया।
क्या तुम उस प्रेम को देख सकते हो जो हर क्षण तुम्हारे अंदर पैदा होता है, जब तुम स्वीकार भाव में होते हो, पूर्ण स्वीकार, पूर्ण समर्पण भाव। तब तुम्हें चिंता नहीं की अगले क्षण क्या होगा, तब तुम्हारा चुनाव गिर जाता है ताश के पत्ते से बने हुए महल की तरह। उस निश्चिंतता में तुम्हें नहीं परवाह आगे क्या होगा या अब तक जीवन में क्या हुआ। क्या ये स्वीकार भाव उतरा है जीवन में?
केवल देखना मात्र है, जैसा है उसे वैसा ही केवल देखा जा रहा है। उसको बदलना नहीं है, उसे पाना नहीं है, कोई पूर्वाग्रह नहीं है, कोई नाम नहीं देना है, कोई ज्ञान नहीं प्राप्त करना है।
जो ना कहता, और ना सुनता,
वही है कहता, वही है सुनता।
जो ना आता, और ना जाता,
वही है आता, वही है जाता।
'मैं साक्षी हूं', यह जानना चेतना है। पर यह भी कौन जान रहा है, उसको ढूंढो तो आप स्वयं ही साक्षी हो, इसमें कोई संशय नहीं रह जायेगा।
जो मुक्त है, यानी साक्षी या अनुभव को जानने वाला, वो सदा मुक्त ही है, वो कभी बंधन में था ही नहीं।
समर्पण क्या है?
समर्पण का अर्थ है सम + अर्पण। जो कुछ भी मैंनें अपने आप को मान लिया है, वो सब कुछ अर्पण कर देना, समर्पण है। अपना अज्ञान, मान्यताओं, पूर्वाग्रह, मतारोपण आदि का त्याग समर्पण है। अपने स्वरूप में समता पूर्वक स्थिति समर्पण है।
आप पहले से ही अपने घर पर हैं, अब कहां जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस संघर्ष को भी समाप्त करने का संघर्ष मत करो, वो भी निरर्थक ही होगा।
ज्ञान मार्ग पर पूजा नहीं,
नहीं तो तुम्हारी पूजा ही कर लेता।
सभी कुछ माया है,
नहीं तो तुमको सत्य ही मान लेता।
One of my old friend asked me "what does purposelessness mean to you? Can you be without any purpose at any point in time?"
साक्षी वो सत्ता या चैतन्य है जो यह शब्द इस समय पढ़ रहा है। उसको कहीं दूर ना समझें, उसे ढूंढने ना निकल पड़ें, वो कहीं नहीं मिलेगा, वो कभी नहीं मिलेगा। इसके दो कारण हैं, पहला वह कहीं गया नहीं तो मिलेगा कैसे, जो दूर है जो कभी अप्राप्त है वो मिल सकता है, पर साक्षी कभी भी अप्राप्त नहीं हुआ है, इसलिये वो प्राप्त नहीं किया जा सकता है।