यह जगत जिसको हम सत्य मान बैठे हैं, क्या वह वाकई सत्य है? क्या यह नित्य है?
कहीं यह हमारी मान्यता तो नहीं हैं कि, जागृत अवस्था सत्य है, जगत सत्य है, मैं तो आता जाता रहता हूँ, जगत तो तब भी था जब मैं नहीं था या जब मैं नहीं रहूँगा आदि आदि।
क्या यह मान्यतायें सही हैं, क्या इन धारणाओं में कुछ भूल तो नहीं है?
थोड़ा सा मनन करने पर एक बिल्कुल भिन्न तथ्य उभरता है। यह सभी दृष्टिकोण तभी तक सही हैं जब तक हमने अपने आप को यह शरीर या मन मान लिया है। पर क्या मैं वाकई शरीर या मन हूँ?